गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

बनावट के आधार पर अलग अलग होते है शौचालय Toilets differ depending on their design

बनावट के आधार पर अलग-अलग होते हैं शौचालय


बनावट के आधार पर अलग-अलग होते हैं शौचालय

आज के इस लेख में बनावट के आधार पर अलग-अलग शौचालय के बारे में जानकारी दी जाएगी। 
समाज को सभ्य  बनाने के लिए शौचालय का निर्माण करना बहुत ही जरूरी होता है। हमारे देश के गावों की स्थिति और सोच अलग तरह की है। लोगों का मानना है कि शौचालय की आवश्यकता क्या है? क्योंकि शौच जाने के लिए लोग खेतों का उपयोग करते हैं जबकि यह भूल जाते हैं कि हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है। जहां वे शौच के लिए जाते हैं वहां कृषि होती है और जब फसल चक्र का क्रम चालू होता है और सभी खेतों में मौसम के आधार पर फसल लगा दिया जाता है इसके अलावा जब बरसात के मौसम में खेतों में पानी भर जाता है तब महिलाएं और बच्चों के लिए शौच जाना बहुत ही मुश्किल कार्य हो जाता है। क्योंकि ऐसी स्थिति में शौच के लिए मात्र एक ही स्थान बचता है वह है सड़क या मार्ग। सड़क पर लोगों का आना-जाना होता है और कई बार ऐसा होता है कि महिलाएं और लड़कियां शौच के लिए सड़क के किनारे जब बैठी रहती हैं तब गांव के किसी व्यक्ति या पुरुष के आने पर मुंह छुपा कर शौच के बीच में ही खड़ा होना पड़ता है। बिना शौचालय के क्या ऐसी संस्कृति का विकास करना चाहते हैं जिसमें अपने घर की इज्जत माता और बहनों को रोड पर खड़ा कर दिया जाए और तो और जिसे दुल्हन कहते हैं जिसका घूंघट एक हाथ लंबा होता है जिसकी उंगली तक देखना गवारा नहीं और चौखट के बाहर आना भी नहीं चाहिए उसे सुबह शाम रोड पर कौन सी इज्जत बढ़ाने के लिए भेजा जाता है अर्थात शौचालय का निर्माण करना सबके लिए जरूरी और आवश्यक है।

आज के लेख में बनावट के आधार पर अलग-अलग शौचालय के बारे में जानकारी दी जा रही है 
 
गड्ढे वाले शौचालय में निसंदेह मल को जमा करके सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है जिसके तरल पदार्थ आसपास मिट्टी में घुस जाते हैं इसलिए यहां पर गड्ढे वाले शौचालय बनावट के 

आधार पर तीन श्रेणियां में बांटा जा सकता है।
  1. उथले गड्ढे वाला शौचालय 
  2. साधारण गड्ढे वाला शौचालय 
  3. पक्के गड्ढे वाला शौचालय ।
इन तीनों प्रकार के शौचायलयों के बारे में आइए एक-एक करके जानकारी प्राप्त करें 

उथले गड्ढे वाले शौचालय 

उथले गड्ढे वाला शौचालय को बनाते समय इसका गड्ढा छोटा बनाया जाता है इसमें प्रत्येक मल त्याग के बाद मल मूत्र को मिट्टी से ढक दिया जाता है इसलिए इसे कभी-कभी कैट प्रणाली भी कहा जाता है। लगभग इस गड्ढे  की गहराई 300 mm से 500 mm तक बनाते देखे गए हैं जो कई हफ्तों तक काम में आते हैं और खोदी गई मिट्टी को ढेर के रूप में जमा कर दिया जाता है इसमें कुछ मिट्टी प्रत्येक मल त्याग के बाद माल के ऊपर डाल दिया जाता है।
ऊपर की मिट्टी में बड़ी संख्या में उपस्थित बैक्टीरिया उथले गड्ढे में मल मूत्र को सड़ाने का कार्य करते हैं और एक बार गड्ढा भर जाने पर दूसरा गड्ढा खोदा जा सकता है। लेकिन इस प्रकार के गड्ढों से चारों ओर बड़ी संख्या में मक्खियों पैदा होती रहती हैं और हुक वर्म एवम कीड़ों के लारवा मक्खियों के द्वारा मनुष्य तक पहुंच कर बीमारी पैदा कर सकती हैं।

साधारा गड्ढे वाले शौचालय

साधारा गड्ढे वाले शौचालय सबसे पुराने किस्म के हैं इसमें गड्ढे के ऊपर बैठने की सीट पट्टी होती है शौचालय के गड्ढे आयताकार वर्गाकार की जगह गोलाकार होते हैं जो टिकाऊ होते हैं ऐसे गड्ढों की गहराई 700 mm से कम नहीं होना चाहिए और 1000 mm से अधिक नहीं होना चाहिए क्योंकि इसके साथ वाली दीवारों के गिरने का खतरा होता है। 
मिट्टी के ढेर से पट्टी के स्तर को उठाने में सुविधा होती है जिससे पानी गड्ढे के अंदर नहीं जा पाता है बैठने के स्थान पर छेद होता है इसके निर्माण के लिए बांस या लकड़ी के टुकड़ों के साथ-साथ स्थानीय सामानों का उपयोग करते हैं अर्थात इसमें बैठने की जो शीट पट्टी होती है वह लकड़ी या बांस की होती है। बैठने के स्थान पर जो छेद होता है उसको ढकने के लिए स्थानीय लकड़ी का उपयोग किया जा सकता है । 

पक्के गड्ढे वाले शौचालय 

पक्के गड्ढे वाले शौचालय वहां बनाए जाते हैं जिन स्थानों पर नर्म मिट्टी होती है गड्ढे को अंदर से पक्का बनाने के लिए लड़कियों की टहनियां , बांस की खपच्ची,पुराने ड्रम ,ईंटों की चिनाई या पत्थरों की चिनाई इसमें से जो भी साधन मौके पर उपलब्ध होते हैं उस से इसका निर्माण किया जाता है ।

अन्य व शेष वस्तु  वही होती है जिससे साधारण गड्ढे वाले शौचालय का निर्माण होता है। इस प्रकार के शौचालय की संरचना बहुत ही सरल होती है। क्योंकि इस शौचालय को एक आसान से दूसरे स्थान पर गड्ढे के भर जाने पर ट्रांसफर करना पड़ता है।

शौचालय के बारे में दी गई जानकारी और इससे संबंधित सूचना यदि लगता है और होना चाहिए तो अपना विचार व्यक्त करें जिसको ध्यान में रखते हुए हमारी टीम यह कोशिश करेगी कि आपकी हर जिज्ञासा को शांत किया जाए।

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

अपने ही मुख से ठीक करे एसिडिटी Correct your acidity with your mouth

अपने ही मुख से ठीक करे एसिडिटी



अपने ही मुख से ठीक करें एसिडिटी। 

आज के इस लेख में हम बताएंगे कि आप अपने ही मुख से ठीक कर सकते हैं एसिडिटी

एसिडिटी सुनने में बहुत हल्की समस्या लगती है लेकिन वास्तव में इतनी हल्की समस्या होती नहीं है।यह छोटी समस्या जरूर है लेकिन ध्यान न देने पर इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।आज के इस लेख में एसिडिटी की समस्या को दूर करने के लिए कुछ सरल उपाय के साथ-साथ अपने मुख से इसे कैसे ठीक कर सकते हैं इसके बारे में प्रकाश डाला जाएगा  

आइए इस के बारे में गहराई से जाने 

सामान्य तौर पर एसिडिटी की जो समस्या है इसके कारण पर यदि ध्यान दिया जाए तो यह बात सामने निकल कर आती है कि अधिक मात्रा में मसालेदार भोजन करना, गरिष्ठ भोजन करना, सिगरेट व शराब पीना ,तंबाकू खाना ,ज्यादा भोजन कर लेना, बिल्कुल भोजन ग्रहण न करना, खाना खाने के बाद तुरंत सो जाना ,खाना खाने के बाद तुरंत पानी पी लेना आदि छोटे-मोटे कारणों से एसिडिटी होते देखा गया है । 
एसिडिटी दूर करने के लिए हम एक अद्भुत और सरल उपाय बताने जा रहे हैं इसके द्वारा धीरे-धीरे एसिडिटी की समस्या से निजात पाया जा सकता है। 
  • यदि एसिडिटी से आप परेशान है और आपको जल्दी में उपाय समझ में ना आ रहा हो तो आप अपने मुंह के लार को घुट घुट  करके निगलना शुरू कर दें। आप देखेंगे कि दो से चार बार में ही आपको आराम महसूस होने लगेगा और एसिडिटी से होने वाली जलन भी कम होने लगेगी।
  • लार ग्रंथियां से निकलने वाले लार में पोटेशियम और बाइकार्बोनेट के आयन उपस्थित होते हैं जो अंदर पहुंच करके एसिडिटी के प्रभाव को कम कर देते हैं क्योंकि पोटेशियम एसिड को उदासीन करता है और लार में उपस्थित ऐमाइलेज एंजाइम भोजन को पचाने में मदद करता है जिससे धीरे-धीरे लार के द्वारा एसिडिटी की समस्या नियंत्रित होने लगती है। 
इस प्रकार समय-समय पर स्वास्थ्य एवं जन कल्याण से संबंधी जानकारी देते रहेंगे।

सती अनुसुइया का वह रहस्य जो दुनिया नहीं जानती ? The secret of anusueya l...

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

खाने में कही सफ़ेद जहर तो नहीं खा रहे है आप Are you eating white poison in your food?

खाने में कहीं आप सफेद जहर तो नहीं खा रहे है आप 


खाने में कहीं आप सफेद जहर तो नहीं खा रहे है आप 

आज के नए लेख का टॉपिक है खाने में कहीं सफेद जहर तो नहीं खा रहे हैं आप 

खाने-पीने और भोज्य सामग्री के बारे में हमारे देश भारत की स्थिति बहुत ही चिंताजनक है क्योंकि अधिकतर प्रोडक्ट में मिलावट और गुणवत्ता की कमी देखी जाती है और यह लोकल कंपनियों में ही नहीं बड़ी-बड़ी कंपनियों में भी मिलावट देखने को मिला है 
गंभीर चिंता का विषय यह भी है कि भारत के हर त्यौहार के उपलक्ष में बनाई गई मिष्ठान और खाद्य सामग्रियों में 98% तक मिलावट देखी जाती है ऐसी स्थिति में हर नागरिक को जागरूक रहना बहुत ही जरूरी है क्योंकि भारत में व्यापार और उद्योग करने वाले को जनता के जीवन से कोई मतलब नहीं उनको केवल अपने लाभ से मतलब है।

भारत सरकार की सभी जांच एजेंसियां और जनहित विभाग बिना दांत वाले शेर के समान है इसलिए जनता को स्वयं जागरूक और जानकारी करने की जरूरत है जिससे अपने जीवन की रक्षा स्वयं कर सके

ऐसी ही जानकारी को बताने के लिए आज के इस लेख में कोशिश किया जा रहा है आईये इस के बारे में और जाने

आज के इस लेख में विशेष जानकारी दी जा रही है जिससे लोगों के जीवन की रक्षा हो सकेगी सफेद जहर के बारे में जो बताया गया है उसका सफेद चीनी से मतलब है।सफेद चीनी को बनाने के लिए बहुत सारे हानिकारक पदार्थों का उपयोग किया जाता है। सफेद चीनी का मतलब है पॉली सेकेराइड।जो विशेष प्रक्रिया से बनता है। हमारा शरीर डाइ सेकेराइड और मोनो सेकेराइड को आसानी से बचा सकता है। जबकि सफेद शक्कर जो पॉली सेकेराइड होता है। हमारा शरीर इसे पॉली सेकेराइड मे परिवर्तित करती है इसके लिए जब लीवर चीनी को पचाने का कार्य करता है तो पचाने के लिए काफी ऊर्जा और कैल्शियम की जरूरत होती है यदि लंबे समय तक सफेद चीनी का उपयोग किया जाए तो चीनी को पचाने के लिए हड्डियों में उपस्थित कैल्शियम ज्यादा खर्च होगी जिससे हड्डियों से संबंधित बीमारी होने लगेगी जैसे गठिया ,ऑस्टियोपोरोसिस, घुटनों का दर्द ,जोड़ों का दर्द ,अर्थराइटिस आदि रोग होने लगेंगे अर्थात शरीर में कैल्शियम की कमी होने पर घुटनों का दर्द ,जोड़ों का दर्द ,गठिया रोग जैसी समस्या उत्पन्न होने लगेगी। 

चीनी को बनाने की प्रक्रिया

चीनी को बनाने की प्रक्रिया में सबसे पहले गन्ने के रस को हार्ट सल्फाॅनेशन अर्थात गर्म सल्फर डाइऑक्साइड से गुजारा जाता है उसके बाद रस के गाढ़े भाग में डिसमेट नामक प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है। 

डिसमेट प्रक्रिया में फारमेल्डिहाइड का उपयोग होता है। फारमेल्डिहाइड वह रसायन है जिससे मरे हुये जानवरों एवम  प्राणियों को सुरक्षित रखा जाता है। अस्पताल में लाशों को सुरक्षित रखने के लिए इसी रासायनिक घोल का उपयोग किया जाता है। शरीर 40 ppm फारमेल्डिहाइड लेने पर यह उत्तकों और कोशिकाओं को सख्त बना देती है। 

गन्ने के रस को तीसरी प्रक्रिया में फास्फोरस पेंटा ऑक्साइड का उपयोग करके इसे दानेदार बनाया जाता है। फास्फोरस पेंटा आक्साइड एक जहरीला रसायन होता है जो शरीर में किसी प्रकार के सूजन के लिए जिम्मेदार होता है इसलिए भी चीनी को सफेद जहर कहा जा सकता है। 

चीनी बनाने की अंतिम प्रक्रिया में पॉलीमर का उपयोग करके चीनी को सफेद और चमकदार बनाया जाता है। पॉलीमर कपड़े के धागे को मजबूत और चमकदार बनाने के काम आता है इस प्रकार  गन्ने का रस मोनोसेकेराइड रासायनिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद पॉलीसेकेराइड बदल जाता है। 

जब चीनी ली जाती है तो शरीर का विटामिन बी नष्ट होने लगता है जिसके कारण हाइपो ग्लेशिमीया जैसी बीमारी हो सकती है। इसके कारण पेन क्रियाज का कार्य धीमा हो जाता है जिसके परिणाम स्वरुप डायबिटीज, खून में कोलेस्ट्रॉल का बढ़ जाना ,बीपी बढ़ जाना और धीरे-धीरे किडनी का कार्य करना बंद हो जाना। 

इस प्रकार 50 ग्राम चीनी रोज खाते हैं तो पेनक्रियाज की उम्र 30% कम हो जाती है। एक अनुमान के अनुसार यदि साल भर चीनी खा रहे हैं तो मात्र दो माह चीनी खाना छोड़ दें तो आपके शरीर में गुणात्मक सुधार हो जाएगा आप देखेंगे कि आपके शरीर में इन्फेक्शन कम हो रही है।  पेट से संबंधित बीमारियां कम हो रही है ,और छोटी-मोटी परेशानियां जैसे कब्ज , एसिडिटी, खट्टी डकार आना यह सब दूर हो जाएगा। 

आज के इस लेख में इतना ही समय-समय पर जनहित में नई-नई जानकारी देते रहेंगे धन्यवाद

बिना मरे प्राप्त कर सकते है मुक्त अवस्था Can get nirvana without death

बिना मरे प्राप्त कर सकते है मुक्त अवस्था 


आज केइस लेख में हम बताएंगे की बिना मरे प्राप्त कर सकते हैं मुक्त अवस्था। 

दुनिया के अधिकतर संप्रदायों में यह बात बताई गई है कि अगर किसी को मुक्त अवस्था प्राप्त करना है तो वह मरने के बाद ही प्राप्त होता है। जबकि सच्चाई यह है कि वह मुक्त अवस्था है ही नहीं। यह एक महाभ्रम पूर्ण प्रचार है जो मानव समाज में व्याप्त है। यह विचार इसलिए फैला हुआ है कि लोगों को मुक्त अवस्था प्राप्त करने की विधि के बारे में पता ही नहीं है। मुक्त अवस्था प्राप्त करना एक विशेष स्थिति होती है जो हम सभी के चित्त से संबंधित होता है। अक्सर लोग मुक्त अवस्था का मतलब यह समझते हैं कि मरने के बाद किसी देवता लोक में रहना ही मुक्त अवस्था है। जबकि वास्तव में सच्चाई यह है कि जिन देवताओं की बात करते हैं उनको खुद ही मुक्त अवस्था प्राप्त नहीं है। दूसरा सबसे बड़ा झूठ से पर्दा उठाना यह भी है कि स्वर्ग लोक का राजा जो इंद्र है वह मालिक है वह मुक्त अवस्था दिलाता है यह भी भ्रम वाला प्रचार है। क्योंकि इंद्र आदि देवताओं की जो लोग चर्चा करते हैं वे सभी काल के अधीन है अर्थात जितने भी ऐसे देवताओं के नाम सुने हैं उन्हें मुक्त अवस्था प्राप्त नहीं है। यही बात अन्य संप्रदाय में भी लागू होती हैं।  

आज के इस लेख में जो विशेष ज्ञान दिया जा रहा है वह अत्यंत दुर्लभ एवं दिव्य है जो देवताओं को भी मिलना आसान नहीं है। इसलिए पूरा लेख जरूर पढ़े क्योंकि तभी आप पूरी बात जान पायेंगे। 

आई इसके बारे में और जानकारी प्राप्त करें 


संसार में प्रत्येक मनुष्य की अंतिम इच्छा यह जरूर रहती है कि वह मुक्त अवस्था प्राप्त करें लेकिन वह सोचता ही रह जाता है और पूरे जीवन ढोंग पाखंड और कर्मकांड में बिता देता है। मुक्त अवस्था वास्तव में एक चैत्तसिक स्थित है और इसके कुछ मूलभूत सिद्धांत है।इसके बिना अनुपालन के मुक्त अवस्था का साक्षात्कार करना संभव नहीं है।मुक्त अवस्था को प्राप्त करने के लिए कुछ योग्यताएं हैं जो आपके पास होनी चाहिए जैसे शील समाधि प्रज्ञा का पालन और इसके साथ पुण्य पारमी और 10 पारमिताओं  के बिना कुछ भी संभव नहीं है। बिना इन सब के पालन के एक नहीं, दो नहीं, लाखों जन्म लेने के बाद भी मुक्त अवस्था संभव ही नहीं है। 

यहाँ मुक्त अवस्था के बारे में संक्षिप्त परिचात्मक दृष्टिकोण रखा जा रहा है जहां 
  • शील का मतलब होता है सदाचार का पालन करना ,अपने अंदर अच्छे गुणों का विकास करना और पूरे जीवन नैतिक मूल्यों पर जीवन व्यतीत करना। 
  • समाधि का मतलब होता है बाहरी चित्त और आंतरिक चित्त को एक साथ जोड़कर मन के गहराई में उतरने का अभ्यास।
  • प्रज्ञा का मतलब होता है वह प्रत्यक्ष ज्ञान जिसके द्वारा सत्य असत्य अंधकार प्रकाश और भास्यमान सत्य को भेदते हुए प्रकृति के सभी घटनाओं को जैसा है वैसे ही देखने की शक्ति का विकास करना।
मुक्त अवस्था प्राप्त करने के लिए पूर्ण बल एवं पारमिता का होना आवश्यक होता है।  पारमिताएं 10 होती है लेकिन इसकी चर्चा हम यहां नहीं करेंगे क्योंकि लेख बड़ा हो जाएगा इसलिए इसकी चर्चा बाद में करेंगे। 

पारमिताएं मनुष्य के अंदर विशेष और दिव्य गुणों के विकास से सम्बंधित है इसे पूरा करने में मनुष्य को थोड़ा समय लगता है। मुक्त अवस्था प्राप्त करने का जो सबसे बड़ा अस्त्र है वह है विपश्यना। 

विपश्यना का मतलब होता है किसी चीज को शुद्ध और विशेष रूप से देखना।विपश्यना पाली भाषा का शब्द है। विपश्यना के द्वारा व्यक्ति अभ्यास करते-करते अपनी बाहरी और आतंरिक मन के गहराई के मैल को धो डालता है और धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आ जाती है कि संस्कार बनने ही नहीं पाते हैं और मनुष्य ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है जिसे नव नित्य सम्भवं के नाम से जाना जाता है इसके बाद मनुष्य अपने अभ्यास और पराक्रम के बल पर चार स्थितियों को प्राप्त करता है। श्रोतापन्न, साकृदागामी,आनागामी, अरिहंत।

इस प्रकार अरिहंत ही ऐसी अवस्था है जो जीवन मुक्ति की अवस्था है इसी के बाद व्यक्ति का कोई भी जन्म नहीं होता वह मुक्त अवस्था प्राप्त कर लेता है। 

इस प्रकार समय पर विभिन्न प्रकार के दुर्लभ ज्ञान और महत्वपूर्ण जानकारी हमारे चैनल पर उपलब्ध होता रहेगा धन्यवाद। 

सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

इस दिशा में ही क्यों बनाना चाहिए शौचालय। Why should toilets be built in this direction only?

इस दिशा में ही क्यों बनाना चाहिए शौचालय।

इस दिशा में ही क्यों बनना चाहिए शौचालय 

हम सभी के भवन में शौचालय का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान होता है इसलिए अक्सर लोग इस बात की चर्चा करते रहते हैं कि यह शौचालय किस दिशा में बनवा जाए। यदि शौचालय का निर्माण सही दिशा में नहीं कराया गया है तो बहुत सारी समस्याओं का आना तय है। कुछ लोगों के जीवन में इतनी बीमारियां हो जाती हैं की दावों का बैग साथ लेकर घूमते रहते हैं। यदि एनालिसिस किया जाए तो यह बात निकाल कर आती है कि उनके घर में वास्तु की समस्या जरूर है। यदि वास्तु की समस्या को हल कर दिया जाए तो बहुत सारी समस्याओं का हल संभव हो सकता है। ऐसी समस्याओं को हल करने के लिए आज के इस लेख में यह जानकारी दी जा रही है।

आईये के बारे में और तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त करें 

हमारे भवन में वास्तु एक देव पुरुष की भांति हैं जिसका उल्लंघन करने पर दुष्परिणाम आने लगते हैं इसलिए वास्तु की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए और इसके अनुरूप भवन का निर्माण करना चाहिए। वास्तु के बारे में बड़ी और गंभीर गलती होने पर उसका छोटे-मोटे उपाय द्वारा निदान संभव नहीं हो पता है। इसलिए वास्तु ज्ञान होना बहुत ही महत्वपूर्ण है। 

कुछ दिशाओं में शौचालय का निर्माण करना बिल्कुल निषेध है  जैसे

  •  नॉर्थ ईस्ट में शौचालय का निर्माण नहीं हो सकता है क्योंकि वास्तु पुरुष का सिर इसी दिशा में रहता है। 
  • साउथ ईस्ट में भी शौचालय बनाना उचित नहीं है क्योंकि यह अग्नि देव का स्थल माना जाता है 
  • इसी प्रकार नॉर्थवेस्ट में भी शौचालय बनाना उचित नहीं है और ना ही बनाया जा सकता क्योंकि यह दिशा धन की दशा मानी जाती है। 

शौचालय बनाने का उचित दिशा 

  • शौचालय बनाने के लिए सही और उचित दिशा साउथ वेस्ट है। इस दिशा में शौचालय बनवा सकते हैं। इस दिशा में शौचालय बनाने से कोई दिक्कत या समस्या नहीं होती है। ऐसा वास्तु शास्त्र विशेषज्ञों का कहना है इसका प्रमुख कारण यह भी है कि इसमें उत्पन्न होने वाली नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव भवन पर नहीं पड़ने पता है। 
आज के इस लेख में इतना ही।
समय-समय पर वास्तु से संबंधित उपयोगी जानकारी देते रहेंगे धन्यवाद। 

इस तरीके से पढ़ोगे तो पढ़ा हुआ हमेशा रहेगा याद। If you read in this way, you will always remember what you read.

इस तरीके से पढ़ोगे तो पढ़ा हुआ हमेशा रहेगा याद


इस तरीके से पढ़ोगे तो पढ़ा हुआ हमेशा रहेगा याद

आज के लेख में पढ़ाई करने के तरीकों के बारे में बताया गया है जिससे पढ़ा हुआ हमेशा याद रहेगा। पढ़ाई लिखाई के क्षेत्र में विद्यार्थियों एवं छोटे बच्चों की यह समस्या रहती है कि याद किया हुआ भूल जाता है और परीक्षा के समय पढ़ा हुआ परीक्षा में मेन समय पर भूल जाने की शिकायत हमेशा करते रहते हैं। किसी चीज को भूल जाने के कई कारण होते हैं जिसे समझना जरूरी होगा क्योंकि बिना समस्या को समझे इलाज संभव नहीं है। हमारा दिमाग किसी चीज को याद कर लेता है और किसी चीज को भूल भी जाता है। इसका मुख्य कारण उस विषय के प्रति दिमाग की रुचि और अरुचि है। पढ़ाई करते समय इसका ध्यान दिया जाए की विषय को रुचिकर और इंट्रेस्टेड  बना दिया जाए तो याद करना आसान हो जाएगा।  

याद करने के तरीके 

याद करने के तरीकों में कुछ महत्वपूर्ण और आवश्यक जानकारी दी जाएगी जो याद करने वालों के लिए काफी उपयोगी होगी। 

इस विधि के बारे में और जानकारी करें --

आप सभी जानते हैं की मन के ऊपर लोगों का नियंत्रण नहीं रहता है इसलिए मन स्वभाव से स्वच्छंद होता हैं। जब से मनुष्य किसी चीज को जानना समझना प्रारंभ किया है तब से लेकर मृत्यु की क्षण तक मन हमेशा चलाएं मान रहता है। इसलिए मनुष्य की बहुत सारी ऊर्जा मन के गतिमान होने में खर्च हो जाती है आज के इस एपीसोड में एक विशेष जानकारी दी जा रही है इसके अभ्यास के द्वारा मन के दौड़ने की गति को कम किया जा सकता है। इसके अलावा पढ़ने और याद करने के कुछ तरीके हैं जिसका पालन करने से याद करना आसान हो जाएगा।  

इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपको daily 20 मिनट का समय देना होगा। 

20 मिनट शांत जगह बैठकर आना पान सती का अभ्यास करना होगा। 

इस अभ्यास के लिए आसन लगाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना होगा। 

ध्यान रहे की फर्श पर कुछ बिछाकर बैठना है।  बैठने के लिए कोई भी आसान सुख पूर्वक चुन सकते हैं या पालथी मारकर बैठ सकते हैं। 

बैठते समय ध्यान दें की सिर, गर्दन और शरीर एक सीध में होना चाहिए। 

उसके बाद चुने हुए आसन पर बैठ जाए फिर सांसों की गति पर ध्यान लगाना होगा कि सांस कैसे आ रही है या जा रही है।

ध्यान करते समय दो बातों का ध्यान देना जरूरी है पहले पूरे शरीर में किसी प्रकार का हलन चलन नहीं होना चाहिए।

दूसरा आंखें बंद है तो बंद ही रखना चाहिए। 

20 मिनट आंखें न खोले और बीच में ना कुछ कहना है पूरे मन को सांसों के आवागमन पर लगाना है। 

साक्क्षी भाव से देखना है कि सांस आ रही है या जा रही है।  यह प्रक्रिया लगातार 20 मिनट तक  करना है।

20 मिनट के पहले आसान से बिल्कुल ना उठे बीच में बार-बार आपके मन में विचार आते रहेंगे लेकिन आपको विचारों में शामिल नहीं होना है केवल विचारों को देखना है कि विचार आ रहे हैं और जा रहे हैं।

 कुछ दिनों के अभ्यास के बाद आप देखेंगे कि विचारों का आना-जाना और विचारों का प्रवाह कम हो गया है तथा धीरे-धीरे भागते दौड़ते मन के ऊपर नियंत्रण होता चला जायेगा और आप मन  के गुलाम बनने की जगह मन के मालिक बन जाएंगे। 

इसके साथ-साथ एक लाभ और भी होगा कि आपके अंदर बैठे हुए नकारात्मक चीजों का अस्तित्व और जड़ उखड़ने लगेगा और कुछ ही दिन के अभ्यास के बाद ही आपके मन की एकाग्रता और याद करने की क्षमता बढ़ने के साथ-साथ कार्य करने की क्षमता में विशेष सुधार होते दिखाई देने लगेगा। 

पढ़ाई के समय याद करने की जो समस्या थी उसका हल निकलने लगेगा। 

इसके अलावा कुछ और भी बदलाव करने की जरूरत है जिसको महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में समझ सकते हैं। आप अपने आदत के बारे में अनुभव किया होगा यदि कोई चीज रंगहीन है और दूसरी चीज रंग बिरंगी है तो आपका ध्यान रंग बिरंगी चीजों पर ज्यादा जाता है अर्थात कोई चीज पढ़ना चालू करें तो पढ़ते समय मुख्य बिंदुओं को हाइलाइटर से कलर कर दिया करें।  जिससे मन उस चीज को तेजी से समझ और ग्रहण कर सके। 

दूसरी बात यह है कि कोई चीज रटने की जगह समझने का प्रयास करें जब किसी चीज को समझ कर पढ़ेंगे तो वह ज्ञान लॉन्ग टर्म मेमोरी में चला जाएगा। जहां पर याद की हुई चीज जल्दी भूलती नहीं है जबकि शॉर्ट टर्म मेमोरी में रहने वाली चीज जल्दी ही भूल जाती हैं। 

जब किसी चीज को रट कर याद करते हैं तो रट कर याद किया हुआ ज्ञान शॉर्ट टर्म मेमोरी में रहता है इसलिए शॉर्ट टर्म मेमोरी की जो चीज हैं वह जल्द ही भूल जाती है। यही मुख्य अंतर है समझ कर पढ़ने में और रट कर याद करने में। 

परीक्षा में आपका ज्ञान धोखा इसलिए दे देता है क्योंकि आप रट कर याद किए हुए रहते हैं।  किसी चीज को समझ कर याद करने के लिए एक जरूरी बात यह है कि बिना देखे उस चीज को रफ पर एक बार जरूर लिख लिया करें।  

आज के एपिसोड में बताई गई तकनीकी छोटी और लाभप्रद है इसलिए इसे आजमा कर देखते हैं तो चमत्कारिक परिणाम  मिलेगा धन्यवाद

बर्तन जो खाद्य पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया नहीं करते? these utensils which do not react with food ?

बर्तन जो खाद्य पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया नहीं करते ये बर्तन अक्रियाशील होते हैं  आज के इस लेख में हम उस बर्तन के बारे में बताएंगे कि वह कौ...