विशेष जानकारी special information लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विशेष जानकारी special information लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 25 जुलाई 2024

बर्तन जो खाद्य पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया नहीं करते? these utensils which do not react with food ?

बर्तन जो खाद्य पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया नहीं करते


ये बर्तन अक्रियाशील होते हैं 


आज के इस लेख में हम उस बर्तन के बारे में बताएंगे कि वह कौन सा बर्तन है जो अक्रियाशील होता है। 
बर्तनो  के बारे में विभिन्न जानकारी के साथ-साथ हम आपको बताना चाहते हैं कि एक ऐसा बर्तन है जिसमें किसी प्रकार का पदार्थ रखने पर उस पदार्थ के संगठन को खराब नहीं करता है। हम बात कर रहे हैं कांच के बर्तनों के विषय में। बर्तनों के उपयोग के क्रम में कांच का बर्तन भी एक अच्छा विकल्प है जिसका उपयोग हम विभिन्न कार्यों में कर सकते हैं। कांच का उपयोग हम अलग-अलग यंत्रों तथा बर्तनों के रूप में करते हैं। हालाकि के कांच के बर्तन महंगे होते हैं तथा इनकी टूटने की संभावना ज्यादा होती है।और एक बात  इसका उपयोग खाना पकाने में नहीं किया जाता है।
कांच के बर्तनो की विशेषता यह है कि किसी भी खाद्य पदार्थ के साथ  क्रिया नहीं करते हैं क्योंकि यह एक जटिल पदार्थ से बने होते हैं।  इन बर्तनों का उपयोग खाद्य सामग्रियों को सुरक्षित रखने में काफी कारगर होता है इसलिए इसका उपयोग अलग-अलग प्रकार के खाद्य सामग्री एवं वस्तुओं को रखने में किया जाता है। सबसे अच्छी बात है यह ना तो एसिड से ना तो बेस से क्रिया करता है इसलिए इसका उपयोग गिलास ,कटोरी ,प्लेट व जार के रूप में किया जाता है। 

सोमवार, 22 जुलाई 2024

ज्यादा आधुनिक उपकरणों के उपयोग से बचें।Avoid using more modern equipment.

ज्यादा आधुनिक उपकरण से बचे 


ज्यादा आधुनिक उपकरणों से बच्चे यह उपकरण कहीं बीमारी के कारण ना बन जाए। 

आज के इस लेख  में हम बताएंगे कि यह आधुनिक उपकरण कहीं आपकी बीमारी का कारण न बन जाए दोस्तों यदि आप में यह चैनल सब्सक्राइब नहीं किए हैं तो इस चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें जिससे आपको नई-नई जानकारी समय-समय पर प्राप्त होती रहे। 

आज के आधुनिक दौर में लोग ऊपरी सुख सुविधाओं में इजाफा करने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के आधुनिक उपकरणों का उपयोग करते हैं परंतु उन उपकरणों के प्रभाव को हम नहीं जान पाते हैं जैसे फ्रिज ,मिक्सी, ग्राइंडर, आदि उपकरण ऐसे उपकरण है जो किचन में ओजोन गैस को उत्पन्न करते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वायु के 10 करोड़ भाग में यदि ओजोन की मात्रा का 50 वा भाग हो तो यह खतरनाक है। 
इसी प्रकार माइक्रोवेव ,कुकीज रेंज ,सोडा मेकर जैसे उपकरण जो गैस और विकिरण किरणे रसोई घर में उत्पन्न करती है जिससे रसोई घर में काम करने वाले लोग सीधे प्रभावित होते हैं। 

इसके अलावा वैज्ञानिको का यहा  तक मानना है की रसोई घर में प्रयोग किए जाने वाले डस्टर, नैपकिन, ड्राईक्लीनिंग के साल्वेंट अर्थात जो घोल  के रूप में प्रयुक्त होते हैं उनसे ट्राई क्लोरो एथीलीन की मात्रा निकलती रहती है जो वायु में 100 पीपीएम से ज्यादा होने पर सेहत एवं खाद्य सामग्रियों पर बुरा प्रभाव डाल सकती है। 

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

भारतीय दुनिया के सबसे गंदे आदमी है। कैसे ? Indian is the world's most di...

भारतीय दुनिया के सबसे गंदे आदमी है कैसे 



भारतीय दुनिया के सबसे गंदे आदमी है कैसे ?

आज के लेख में हम बताएंगे कि कैसे भारतीय दुनिया के सबसे गंदे आदमी हैं ? भारतीय जन समुदाय में अनपढ़, गरीब इनकी संख्या अधिक होने से उनके अंदर सामान्य चीजों के प्रति भी जागरूकता नहीं देखी जाती है। इसके लिए जिम्मेदार है यहां की व्यवस्था, यहां अयोग्य लोगों का शासन है ,यहां की सरकारें जाति धर्म और निजी स्वार्थ से ऊपर उठ नहीं पा रही है। पूरे देश को देखने के बाद यही मालूम होता है जितने जिम्मेदार लोग हैं उसमें से एक प्रतिशत लोग भी पढ़े लिखे नहीं है क्योंकि पढ़ा लिखा व्यक्ति जाति धर्म जैसी निराधार बात को मानता ही नहीं है। क्योंकि यह मूर्खता एवं अंधविश्वास का मार्ग है। यहां का शासक वर्ग यहां की जनता को जान बूझकर अशिक्षित और लाचार बनाकर रखा है जिससे कि शासन करना आसान हो जाए।  इसलिए दुनिया में भारत की छवि बहुत ही खराब दिखती है। ऐसे ही एक अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी द्वारा अध्ययन एवं विश्लेषण पर यह पाया गया है कि भारत के लोग अजागरूक एवं बेहद लापरवाह होते हैं। 

इसके बारे में आईये और जानकारी प्राप्त करते हैं 

जहां पूरे दुनिया में जल संचय एवं जल शुद्धता की बात हो रही है उसके लिए भिन्न-भिन्न प्रभावी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं परंतु भारत में ढोंग एवं अंधविश्वास के कारण से इसके साथ साथ मूर्खतापूर्ण व्यवस्था के कारण से लगातार नदियों के पानी को गंदा किया जा रहा है। एक बड़ा वर्ग समुदाय जो इस पर चिंता करता रहा है कि जल संकट का आखिरकार कारण क्या है तो बात सामने आती है, वह है जल प्रदूषण।

जहरीले कीटनाशक पदार्थ एवं रासायनिक खादों का नाइट्रेट भूजल में लगातार मिल रहा है, बढ़ते उद्योगों से निकाला गया वेस्ट पदार्थ और गंदगी अधिकतर नदियों में गिरायी जा रही है। इससे नदियां गंदे नालों में बदल चुकी है। इसके अलावा पूरे शहर का कचरा नदियों में गिराया जा रहा है। 
नदियों के गंदगी के हिसाब से सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (center for science and environment ) के अनुसार पांचवें नागरिक को पर्यावरण रिपोर्ट मे भारतीयों को सबसे गंदे आदमी की उपाधि दे चुकी है। सन 1990 के दशक में भारत में 10 लाख से ज्यादा बच्चे एवं नागरिक जल जनित रोगों से अकाल मृत्यु के शिकार हुए।
आजादी के बाद से अब तक गंदे पानी की वजह से 5 करोड़ से ज्यादा बच्चे जान गंवा चुके हैं। गंगा एक्शन प्लान ( GAP ) से पहले गंगा में 87 करोड़ 30 लाख लीटर गंदगी हर रोज बहाई जा रही थी। 
एक छोटी सी नदी साबरमती भी अहमदाबाद शहर का 99 करोड़ 80 लाख लीटर गंदा पानी हर रोज ढ़ो रही है। 

इस प्रकार कहा जा सकता है की नदियों के गंदा होने का कारण  यहां की कंपनियां, कारखाने एवं यहां के लोग ही हैं। 

धन्यवाद

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

मानव की लापरवाही से हो सकता है विश्व युद्ध | Human negligence can lead to world war.

मानव की लापरवाही से हो सकता है विश्व युद्ध 


मानव की लापरवाही से हो सकता है विश्व युद्ध 

आज इस लेख में बताएंगे कि मानव की लापरवाही से हो सकता है विश्व युद्ध 

धरती पर से जितने भी जीव हैं उन सारे जीवों  में मनुष्य ही सबसे लापरवाह जीव है। मानव सभ्यता के विकसित एवं विकास के क्रम में मनुष्य अपने स्वार्थ के आधार पर ही काम करता रहा है और आश्चर्य की बात है कि विकास के प्रारम्भ से भी यही बात थी और आज भी यही बात है परंतु मनुष्य को पृथ्वी पर कोई भी गतिविधि करने से पहले यह ध्यान देना चाहिए कि जनजीवन और पर्यावरण पर इनका क्या प्रभाव पड़ेगा काफी लंबे समय से मानव समूह जल संसाधनों का उपयोग करता रहा है परंतु उचित और न्याय संगत प्रक्रिया से पीछे रहा है इस कारण पूरे विश्व में जल का अभाव होने के कारण से विश्व युद्ध की स्थिति बन सकती है। इस लेख में जल से संबंधित समस्याओं को दर्शाया गया जो विशेष ध्यान देने योग्य है 

आईये और आगे बढ़े 

भारत में अजीब बिडंबना है जो जगह-जगह देखने को मिलती है। कहीं जमीन पानी की प्यासी है तो कहीं भयंकर बाढ़ देखने को मिलता है। एक आंकड़े के अनुसार चार करोड़ हेक्टेयर भूमि ऐसी है जहां हर साल बाढ़ आने की आशंका बनी रहती है। हर साल औसतन 80 लाख हेक्टेयर भूमि बाढ़ की त्रासदी का शिकार हो जाती है। इस प्रकार 37 लाख हेक्टेयर फसल बाढ़ से बर्बाद हो जाती है। समुद्री तूफ़ान भी मनुष्य की लापरवाही से ही आते हैं। पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, जलवायु परिवर्तन से काफी चिंतित है वैज्ञानिकों का कहना है कि कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों की मात्रा बढ़ने से सूरज की गर्मी धरती की हवा में कैद रह जाती है और लौट कर वापस नहीं जा पाती है। ओजोन की परत जो छतरी की तरह तीव्र पराबैंगनी किरणों को रोकती रही थी वह जगह-जगह से फट रही है क्योंकि उसे क्लोरोफ्लोरोकार्बन जैसी गैसे खाती जा रही है। 
धरती गर्मा रही है इसलिए अगली सदी में औसतन तापमान बढ़ने से मिट्टी में नमी और वर्षा के अनुपात में बदलाव आएगा गर्माती धरती दुनिया के मीठे पानी के आपूर्ति में बदलाव कर सकती है। धरातल के औसतन तापमान में मामूली बढ़त भी हिम नदी एवं बर्फीली चोटियों को पिघला  सकती है जिससे समुद्र का जल स्तर ऊंचा हो सकता है। इस कारण से समुद्र तट के पास वाले इलाकों को तूफानी लहरों का सामना करना पड़ेगा। समुद्र की सतह का तापमान बढ़ने से उष्णकटिबंधीय चक्रवात बनते हैं। 

लगातार धरती का तापमान बढ़ रहा है तथा साथ ही साथ जल संकट भी बढ़ रहा है इस समस्या के पीछे मनुष्य ही कारण है क्योंकि सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाला मनुष्य ही है। जल संकट के बढ़ने का असर इन विवादों में दिखाई पड़ रहे हैं जो नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर उत्पन्न हो रही है। यह समस्या पूरी दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है।
दुनिया में 13 नदिया और झीलें ऐसी है जो 96 देशो के हिस्से में आती है। कम से कम 214 नदियों के कछार ऐसे है जो कई देशों में स्थित है जैसे की 57 अफ्रीकी देशों में और 48 यूरोपीय देशो में।  

यूरोप में चार या इससे अधिक देशों में पानी के बंटवारे को लेकर 175 से अधिक समझौते भी हुए हैं। फिर भी पानी को लेकर मारामारी होती रहती है। खास तौर पर निकट पूर्वी देशों में यह समस्या देखने को मिलती है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम इसको शार्ट फॉर्म में  UNEP भी कहते हैं। इसके अधीन जो देश नदी घाटी को आपस में बाट कर शांति भाव से पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें जल संसाधनों के प्रबंधकों के लिए प्राथमिकता के आधार पर सहायता दी जाती है।

आठ अफ्रीकी  देश एक नदी ज़ाम्बेज़ी के पानी का मिलजुल कर इस्तेमाल कर रहे हैं और इन्हे UNEP ने आर्थिक  सहायता भी दी है। 

यदि दुनिया के लोग पर्यावरण और  प्राकृतिक संसाधनों का ठीक से उपयोग नहीं करेंगे तो पूरी दुनिया के लिए समस्या हो सकती है। क्योंकि प्रदूषण से  ही यह सारी समस्या उत्पन्न होती है और लापरवाही और अनजाने में ही पूरी दुनिया के लोग विश्व युद्ध की स्थिति उत्पन्न कर लेंगे। 

आप सभी पाठको से नम्र निवेदन है कि पर्यावरण की रक्षा हेतु स्वयं को जागरूक करें और दूसरों को भी इस लेख  को शेयर जरूर करें धन्यवाद। 

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

राजस्व यज्ञ का फल मिलता है इसे लगाने से By performing this, one gets the results of Revenue Yagya.

राजस्व यज्ञ का फल मिलता है इसे लगाने से 


आज के नए एपिसोड में हम ऐसे पौधे के बारे में बतायेंगे जिसको लगाने से राजस्व यज्ञ के समान फल मिलता है। 
संसार के विकास के क्रम में पेड़ पौधों का बहुत ही योगदान एवं भूमिका है। हमारे आसपास कई ऐसे पौधे हैं जो बहुत ही महत्वपूर्ण और अतिलाभकारी है। जिनके बारे में हम ना ठीक से जान पाते हैं और ना पहचान कर पाते हैं। इसलिए उनका अपने जीवन में सदुपयोग नहीं कर पाते हैं।आज के एपिसोड में ऐसे ही एक चमत्कारी वृक्ष के बारे में बात करने जा रहे हैं जो अतिफलदायी है। इसके साथ-साथ यह हमारे परिवार के लिए और पर्यावरण के लिए अर्थात दोनों के लिए लाभप्रद है। 

ऐसे विशेष जानकारी के लिए आईये आगे बढ़ते हैं। 

हमारे आसपास और पर्यावरण में भिन्न-भिन्न प्रकार के पेड़ पौधे एवं वृक्ष पाए जाते हैं जिनको यदि हम लोग ठीक से जान ले तो हमारे जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। यह पेड़ आसानी से उपलब्ध हो जाता है और इसको अगर घर के सामने लगते हैं तो काफी अच्छा परिणाम आ सकता है। इसको लगाने के लिए ध्यान देना चाहिए इसे ऐसी जगह लगाए जहां पर इसकी छति होने संभावना काम हो। इसे संस्कृत में काफी विशेषताओं के साथ इसका उल्लेख किया गया है और बताया गया है कि यदि इसे कार्तिक मास के समय लगाया जाए और लगाते समय यह भी ध्यान दिया जाए कि इसे  उत्तर दिशा में लगाया जाए तो इसका फल राजस्व यज्ञ के बराबर मिलता है। इस वृक्ष का नाम आँवला है और इस पेड़ का महत्व औषधि गुणों  के लिए काफी अधिक अच्छा माना जाता है। हिंदू संप्रदाय में इसे श्रद्धा के साथ सम्मान किया करते हैं और विशेष तिथि के आने पर इस वृक्ष के नीचे खाना बनाकर खाते हैं। ऐसा बताया जाता है कि यह वृक्ष जहां लगे होते हैं वह के लोग लोगों के पापों का समन हो जाता है इस प्रकार इस वृक्ष को लगाते हैं तो आपको राजस्व यज्ञ की तरह फल मिलता है। 

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

क्या जानते है 3300 ईसा पूर्व टैटू का इतिहास और सच्चाई What do you know about the history and truth of 3300 BC tattoo?

क्या जानते है 3300 ईसा पूर्व टैटू का इतिहास और सच्चाई

आज हम टैटू का इतिहास और इसकी सच्चाई बतायेंगे।  टैटू का इतिहास और सच्चाई
आज कल आधुनिक दौर में युवाओ का एक बड़ा वर्ग बड़े तेजी से टैटू के फैशन के तरफ दौड़ता चला जा रहा है।  ऐसे लोगो की रूचि को देखते हुये हमारे चैनल की टीम ने यह विचार किया है की क्यों ना इसके बारे में जानकारी दिया जाय। जिससे लोग इसके बारे में अवगत हो सके क्योकि इस तरह की जानकारी लोगो को आसानी से प्राप्त नहीं हो पाती है। 

आइये इसके बारे में और जाने -

टैटू का फैशन अपने देश में ही नहीं विदेशो में भी बड़े पैमाने पर देखने को मिलता है। विदेशो में युवतिया इतनी शौक़ीन है कि ऐसी-ऐसी जगह टैटू बनवाती है जहा पर लोग सोच भी नहीं सकते है। 
दुख और खेद की बात यह है की विदेशो में भी लोग ऐसी जानकारी से अनजान है। वैसे इतिहास खंगाला जाय तो यह ज्ञात होता है कि इसका प्रचलन और फैशन बहुत पुराना है। प्राचीन काल में 3300 ईसापूर्व इसका प्रचलन देखने को मिलता है। उस समय इसका उपयोग बड़े पैमाने पर एक पहचान के रूप में लाया जाता था। जनजाति के लोग अलग-अलग टैटुओ का उपयोग अपनी पहचान के लिए करते थे। लेकिन आज कल इसका उपयोग बिल्कुल बदल चूका है। आज के युवक और युवतिया इसका उपयोग प्यार का इजहार अथवा कृतज्ञता , स्वतंत्रता ,सुरक्षा आदि के लिए अपनी कलाई , कोहनी ,फेस पर विशेष प्रकार कि डिजाइन के रूप में बनवाते हुये देखा जाता है। 
इस प्रकार के दुर्लभ और रोचक जानकारी बार-बार दी जाती है अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिये और महत्वपूर्ण जानकारी के लिये हमारे चैनल को फॉलो जरूर करे। 
.

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

बनावट के आधार पर अलग अलग होते है शौचालय Toilets differ depending on their design

बनावट के आधार पर अलग-अलग होते हैं शौचालय


बनावट के आधार पर अलग-अलग होते हैं शौचालय

आज के इस लेख में बनावट के आधार पर अलग-अलग शौचालय के बारे में जानकारी दी जाएगी। 
समाज को सभ्य  बनाने के लिए शौचालय का निर्माण करना बहुत ही जरूरी होता है। हमारे देश के गावों की स्थिति और सोच अलग तरह की है। लोगों का मानना है कि शौचालय की आवश्यकता क्या है? क्योंकि शौच जाने के लिए लोग खेतों का उपयोग करते हैं जबकि यह भूल जाते हैं कि हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है। जहां वे शौच के लिए जाते हैं वहां कृषि होती है और जब फसल चक्र का क्रम चालू होता है और सभी खेतों में मौसम के आधार पर फसल लगा दिया जाता है इसके अलावा जब बरसात के मौसम में खेतों में पानी भर जाता है तब महिलाएं और बच्चों के लिए शौच जाना बहुत ही मुश्किल कार्य हो जाता है। क्योंकि ऐसी स्थिति में शौच के लिए मात्र एक ही स्थान बचता है वह है सड़क या मार्ग। सड़क पर लोगों का आना-जाना होता है और कई बार ऐसा होता है कि महिलाएं और लड़कियां शौच के लिए सड़क के किनारे जब बैठी रहती हैं तब गांव के किसी व्यक्ति या पुरुष के आने पर मुंह छुपा कर शौच के बीच में ही खड़ा होना पड़ता है। बिना शौचालय के क्या ऐसी संस्कृति का विकास करना चाहते हैं जिसमें अपने घर की इज्जत माता और बहनों को रोड पर खड़ा कर दिया जाए और तो और जिसे दुल्हन कहते हैं जिसका घूंघट एक हाथ लंबा होता है जिसकी उंगली तक देखना गवारा नहीं और चौखट के बाहर आना भी नहीं चाहिए उसे सुबह शाम रोड पर कौन सी इज्जत बढ़ाने के लिए भेजा जाता है अर्थात शौचालय का निर्माण करना सबके लिए जरूरी और आवश्यक है।

आज के लेख में बनावट के आधार पर अलग-अलग शौचालय के बारे में जानकारी दी जा रही है 
 
गड्ढे वाले शौचालय में निसंदेह मल को जमा करके सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है जिसके तरल पदार्थ आसपास मिट्टी में घुस जाते हैं इसलिए यहां पर गड्ढे वाले शौचालय बनावट के 

आधार पर तीन श्रेणियां में बांटा जा सकता है।
  1. उथले गड्ढे वाला शौचालय 
  2. साधारण गड्ढे वाला शौचालय 
  3. पक्के गड्ढे वाला शौचालय ।
इन तीनों प्रकार के शौचायलयों के बारे में आइए एक-एक करके जानकारी प्राप्त करें 

उथले गड्ढे वाले शौचालय 

उथले गड्ढे वाला शौचालय को बनाते समय इसका गड्ढा छोटा बनाया जाता है इसमें प्रत्येक मल त्याग के बाद मल मूत्र को मिट्टी से ढक दिया जाता है इसलिए इसे कभी-कभी कैट प्रणाली भी कहा जाता है। लगभग इस गड्ढे  की गहराई 300 mm से 500 mm तक बनाते देखे गए हैं जो कई हफ्तों तक काम में आते हैं और खोदी गई मिट्टी को ढेर के रूप में जमा कर दिया जाता है इसमें कुछ मिट्टी प्रत्येक मल त्याग के बाद माल के ऊपर डाल दिया जाता है।
ऊपर की मिट्टी में बड़ी संख्या में उपस्थित बैक्टीरिया उथले गड्ढे में मल मूत्र को सड़ाने का कार्य करते हैं और एक बार गड्ढा भर जाने पर दूसरा गड्ढा खोदा जा सकता है। लेकिन इस प्रकार के गड्ढों से चारों ओर बड़ी संख्या में मक्खियों पैदा होती रहती हैं और हुक वर्म एवम कीड़ों के लारवा मक्खियों के द्वारा मनुष्य तक पहुंच कर बीमारी पैदा कर सकती हैं।

साधारा गड्ढे वाले शौचालय

साधारा गड्ढे वाले शौचालय सबसे पुराने किस्म के हैं इसमें गड्ढे के ऊपर बैठने की सीट पट्टी होती है शौचालय के गड्ढे आयताकार वर्गाकार की जगह गोलाकार होते हैं जो टिकाऊ होते हैं ऐसे गड्ढों की गहराई 700 mm से कम नहीं होना चाहिए और 1000 mm से अधिक नहीं होना चाहिए क्योंकि इसके साथ वाली दीवारों के गिरने का खतरा होता है। 
मिट्टी के ढेर से पट्टी के स्तर को उठाने में सुविधा होती है जिससे पानी गड्ढे के अंदर नहीं जा पाता है बैठने के स्थान पर छेद होता है इसके निर्माण के लिए बांस या लकड़ी के टुकड़ों के साथ-साथ स्थानीय सामानों का उपयोग करते हैं अर्थात इसमें बैठने की जो शीट पट्टी होती है वह लकड़ी या बांस की होती है। बैठने के स्थान पर जो छेद होता है उसको ढकने के लिए स्थानीय लकड़ी का उपयोग किया जा सकता है । 

पक्के गड्ढे वाले शौचालय 

पक्के गड्ढे वाले शौचालय वहां बनाए जाते हैं जिन स्थानों पर नर्म मिट्टी होती है गड्ढे को अंदर से पक्का बनाने के लिए लड़कियों की टहनियां , बांस की खपच्ची,पुराने ड्रम ,ईंटों की चिनाई या पत्थरों की चिनाई इसमें से जो भी साधन मौके पर उपलब्ध होते हैं उस से इसका निर्माण किया जाता है ।

अन्य व शेष वस्तु  वही होती है जिससे साधारण गड्ढे वाले शौचालय का निर्माण होता है। इस प्रकार के शौचालय की संरचना बहुत ही सरल होती है। क्योंकि इस शौचालय को एक आसान से दूसरे स्थान पर गड्ढे के भर जाने पर ट्रांसफर करना पड़ता है।

शौचालय के बारे में दी गई जानकारी और इससे संबंधित सूचना यदि लगता है और होना चाहिए तो अपना विचार व्यक्त करें जिसको ध्यान में रखते हुए हमारी टीम यह कोशिश करेगी कि आपकी हर जिज्ञासा को शांत किया जाए।

सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

इस तरीके से पढ़ोगे तो पढ़ा हुआ हमेशा रहेगा याद। If you read in this way, you will always remember what you read.

इस तरीके से पढ़ोगे तो पढ़ा हुआ हमेशा रहेगा याद


इस तरीके से पढ़ोगे तो पढ़ा हुआ हमेशा रहेगा याद

आज के लेख में पढ़ाई करने के तरीकों के बारे में बताया गया है जिससे पढ़ा हुआ हमेशा याद रहेगा। पढ़ाई लिखाई के क्षेत्र में विद्यार्थियों एवं छोटे बच्चों की यह समस्या रहती है कि याद किया हुआ भूल जाता है और परीक्षा के समय पढ़ा हुआ परीक्षा में मेन समय पर भूल जाने की शिकायत हमेशा करते रहते हैं। किसी चीज को भूल जाने के कई कारण होते हैं जिसे समझना जरूरी होगा क्योंकि बिना समस्या को समझे इलाज संभव नहीं है। हमारा दिमाग किसी चीज को याद कर लेता है और किसी चीज को भूल भी जाता है। इसका मुख्य कारण उस विषय के प्रति दिमाग की रुचि और अरुचि है। पढ़ाई करते समय इसका ध्यान दिया जाए की विषय को रुचिकर और इंट्रेस्टेड  बना दिया जाए तो याद करना आसान हो जाएगा।  

याद करने के तरीके 

याद करने के तरीकों में कुछ महत्वपूर्ण और आवश्यक जानकारी दी जाएगी जो याद करने वालों के लिए काफी उपयोगी होगी। 

इस विधि के बारे में और जानकारी करें --

आप सभी जानते हैं की मन के ऊपर लोगों का नियंत्रण नहीं रहता है इसलिए मन स्वभाव से स्वच्छंद होता हैं। जब से मनुष्य किसी चीज को जानना समझना प्रारंभ किया है तब से लेकर मृत्यु की क्षण तक मन हमेशा चलाएं मान रहता है। इसलिए मनुष्य की बहुत सारी ऊर्जा मन के गतिमान होने में खर्च हो जाती है आज के इस एपीसोड में एक विशेष जानकारी दी जा रही है इसके अभ्यास के द्वारा मन के दौड़ने की गति को कम किया जा सकता है। इसके अलावा पढ़ने और याद करने के कुछ तरीके हैं जिसका पालन करने से याद करना आसान हो जाएगा।  

इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपको daily 20 मिनट का समय देना होगा। 

20 मिनट शांत जगह बैठकर आना पान सती का अभ्यास करना होगा। 

इस अभ्यास के लिए आसन लगाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना होगा। 

ध्यान रहे की फर्श पर कुछ बिछाकर बैठना है।  बैठने के लिए कोई भी आसान सुख पूर्वक चुन सकते हैं या पालथी मारकर बैठ सकते हैं। 

बैठते समय ध्यान दें की सिर, गर्दन और शरीर एक सीध में होना चाहिए। 

उसके बाद चुने हुए आसन पर बैठ जाए फिर सांसों की गति पर ध्यान लगाना होगा कि सांस कैसे आ रही है या जा रही है।

ध्यान करते समय दो बातों का ध्यान देना जरूरी है पहले पूरे शरीर में किसी प्रकार का हलन चलन नहीं होना चाहिए।

दूसरा आंखें बंद है तो बंद ही रखना चाहिए। 

20 मिनट आंखें न खोले और बीच में ना कुछ कहना है पूरे मन को सांसों के आवागमन पर लगाना है। 

साक्क्षी भाव से देखना है कि सांस आ रही है या जा रही है।  यह प्रक्रिया लगातार 20 मिनट तक  करना है।

20 मिनट के पहले आसान से बिल्कुल ना उठे बीच में बार-बार आपके मन में विचार आते रहेंगे लेकिन आपको विचारों में शामिल नहीं होना है केवल विचारों को देखना है कि विचार आ रहे हैं और जा रहे हैं।

 कुछ दिनों के अभ्यास के बाद आप देखेंगे कि विचारों का आना-जाना और विचारों का प्रवाह कम हो गया है तथा धीरे-धीरे भागते दौड़ते मन के ऊपर नियंत्रण होता चला जायेगा और आप मन  के गुलाम बनने की जगह मन के मालिक बन जाएंगे। 

इसके साथ-साथ एक लाभ और भी होगा कि आपके अंदर बैठे हुए नकारात्मक चीजों का अस्तित्व और जड़ उखड़ने लगेगा और कुछ ही दिन के अभ्यास के बाद ही आपके मन की एकाग्रता और याद करने की क्षमता बढ़ने के साथ-साथ कार्य करने की क्षमता में विशेष सुधार होते दिखाई देने लगेगा। 

पढ़ाई के समय याद करने की जो समस्या थी उसका हल निकलने लगेगा। 

इसके अलावा कुछ और भी बदलाव करने की जरूरत है जिसको महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में समझ सकते हैं। आप अपने आदत के बारे में अनुभव किया होगा यदि कोई चीज रंगहीन है और दूसरी चीज रंग बिरंगी है तो आपका ध्यान रंग बिरंगी चीजों पर ज्यादा जाता है अर्थात कोई चीज पढ़ना चालू करें तो पढ़ते समय मुख्य बिंदुओं को हाइलाइटर से कलर कर दिया करें।  जिससे मन उस चीज को तेजी से समझ और ग्रहण कर सके। 

दूसरी बात यह है कि कोई चीज रटने की जगह समझने का प्रयास करें जब किसी चीज को समझ कर पढ़ेंगे तो वह ज्ञान लॉन्ग टर्म मेमोरी में चला जाएगा। जहां पर याद की हुई चीज जल्दी भूलती नहीं है जबकि शॉर्ट टर्म मेमोरी में रहने वाली चीज जल्दी ही भूल जाती हैं। 

जब किसी चीज को रट कर याद करते हैं तो रट कर याद किया हुआ ज्ञान शॉर्ट टर्म मेमोरी में रहता है इसलिए शॉर्ट टर्म मेमोरी की जो चीज हैं वह जल्द ही भूल जाती है। यही मुख्य अंतर है समझ कर पढ़ने में और रट कर याद करने में। 

परीक्षा में आपका ज्ञान धोखा इसलिए दे देता है क्योंकि आप रट कर याद किए हुए रहते हैं।  किसी चीज को समझ कर याद करने के लिए एक जरूरी बात यह है कि बिना देखे उस चीज को रफ पर एक बार जरूर लिख लिया करें।  

आज के एपिसोड में बताई गई तकनीकी छोटी और लाभप्रद है इसलिए इसे आजमा कर देखते हैं तो चमत्कारिक परिणाम  मिलेगा धन्यवाद

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

शौचालय का ऐसा ऐतिहासिक घटना जिसे नहीं जानती दुनिया। Such a historical incident of toilet which the world does not know.

शौचालय का ऐसा ऐतिहासिक घटना जिसे नहीं जानती दुनिया।

शौचालय का ऐसा ऐतिहासिक घटना जिसे नहीं जानती दुनिया। 

शौचालय का ऐसा ऐतिहासिक घटना बताने जा रहा हूं जिसे शायद ही दुनिया जानती है। मनुष्य के आवास में शौचालय का महत्वपूर्ण स्थान होता है क्योंकि शौचालय हमारे मान सम्मान और सामाजिक स्तर को व्यक्त करता है। हमारे देश भारत में शौचालय के लिए बहुत सारी योजनाएं चलाई जा रही हैं। वर्तमान समय में भी स्वच्छता अभियान के रूप में शौचालय निर्माण की प्रक्रियाएं चलाई जा रही हैं। बहुत सारे टीवी चैनल पर भी शौचालय से संबंधित और स्वच्छता के बारे में स्वच्छता जागरूकता विज्ञापन बनाकर जनता के सामने दिखाया जा रहा है। जिसमें यह बताने की कोशिश की गई है कि मान सम्मान बनाए रखने के लिए शौचालय का निर्माण कराना आवश्यक है। वास्तव में शौचालय जरूरी होने के साथ-साथ वस्तु प्रभाव के रूप में भी मनुष्य के जीवन पर काफी असर डालती है। आज के इस लेख में शौचालय के महत्व को देखते हुए ऐसी विशेष जानकारी दी जा रही है। जिसे जन सामान्य लोग नहीं जानते हैं। ऐसी ही महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक जानकारी हमारे चैनल के माध्यम से आपके सामने प्रस्तुत की जा रही है। 
 आईये ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी के बारे में और जाने 
आज के इस लेख में जो जानकारी दी जा रही है वह अति महत्वपूर्ण और प्रामाणिक है यह जानकारी अन्य किसी चैनल पर संभवतः नहीं मिलेगा। यह ज्ञान प्राप्त करने वालों के लिए विशेष प्रकार की प्रस्तुति है इसलिए आपसे आग्रह है कि पूरा ब्लॉक जरूर पढ़ें। यहां दी जाने वाली जानकारी प्राचीन इतिहास से लेकर वर्तमान समय तक की अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख किया जा रहा है जो शौचालय निर्माण एवं स्वच्छता पर आधारित है और विश्व स्तरीय भी है।
महत्वपूर्ण स्वच्छता एवं शौचालय से संबंधित घटनाएं इस प्रकार हैं
  • 1000 ईसा पूर्व में पर्शियन खाड़ी में बहराइन द्वीप पर फ्लस शौचालय का निर्माण किया गया।
  •  69 ईसवी में स्पैसियूनूस ऑटो साम्राज्य ने पहली बार शौचालय पर कर लगवाया। 
  • 1214 ईस्वी में यूरोप में पहली बार झाड़ू वालों द्वारा शौचालय संचालित कराया गया।
  • 1596 में जॉन हैरिंग्स्टन ने जल युक्त शौचगृह का आविष्कार किया। 
  • 1668 में पुलिस आयुक्त पेरिस द्वारा सभी घरों में शौचालय निर्माण का फरमान जारी किया गया।
  • 1772 ईस्वी में यूरोप में पहली बार भुगतान किए जाने वाले शौचालय का निर्माण हुआ।
  • 1824 ईस्वी में पेरिस में पहला जन शौचालय बनवाया गया। 
  • 1842 ईस्वी में एडविन चैडविक द्वारा संसद में जन सफाई यानि स्वच्छता कानून प्रस्तुत किया।
  • 1869 ईस्वी में सीवर के पानी को उपयोग के आधार पर खाद के रूप में इस्तेमाल किया गया।
  • 1881ईस्वी में पेरूसाल फ्रांस में जानमोरस ने सेप्टिक टैंक का पेटेंट करवाया इन्होंने इसको पहली बार अपने घर में बनवाया।
  • 1883 ईस्वी में महारानी विक्टोरिया के लिए थॉमस ट्यूफर्ड ने पहला सिरेमिक शौचालय बनवाया। 
  • 1951 ईस्वी में पहली पंचवर्षीय योजना दस्तावेज में जल आपूर्ति तथा स्वच्छता को शामिल किया गया।
  • 1961 ईस्वी में स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय स्वास्थ्य मंत्रालय भारत सरकार द्वारा ग्रामीण शौचालय कार्यक्रम का तकनीकी दस्तावेज का  प्रकाशन हुआ।
  • 1978 vacnt  शौचालय को स्वच्छ वाटर सील शौचालय में बदलने के बारे में भारत सरकार विश्व स्वास्थ्य संगठन यूनिसेफ के सामूहिक प्रयास से राष्ट्रीय सेमिनार पटना में आयोजन किया गया।
  • 1985 ईस्वी में तकनीकी परामर्श ग्रुप ने मार्च 1985 में दो गड्ढे वाले शौचालय के निर्माण के संबंध में विस्तृत विशिष्टियों का प्रकाशन किया।
  • 1986 ईस्वी में केंद्र द्वारा प्रायोजित ग्रामीण कार्यक्रम का शुरूआत किया गया। 
  • आठवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक सफाई कर्मचारियों को छुटकारा दिलाने तथा पुनर्वास करने के उद्देश्य से शहर में स्वच्छ शौचालय में बदलने हेतु केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित कम लागत का स्वच्छता कार्यक्रम चलाया गया।
  • 1993 में केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता की समीक्षा की गई। 
  • 1995 में स्वच्छता के बारे में मिशन के आधार पर राष्ट्रीय परामर्श दिया गया। 
2017 से  स्वच्छ भारत मिशन का संचालन चल रहा है। 

बर्तन जो खाद्य पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया नहीं करते? these utensils which do not react with food ?

बर्तन जो खाद्य पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया नहीं करते ये बर्तन अक्रियाशील होते हैं  आज के इस लेख में हम उस बर्तन के बारे में बताएंगे कि वह कौ...