शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

रानी पदमावती का जीवन जब एक जादूगर ने किया बर्बाद ?

रानी पदमावती का जीवन जब एक जादूगर ने किया बर्बाद 
रानी पद्ममावती का जीवन जब एक जादूगर ने किया बर्बाद 

आज हम बतायेंगे कैसे रानी पद्ममावती का जीवन एक जादूगर ने बर्बाद किया। 
भारतवर्ष में बहुत सारे ऐसे ऐतिहासिक ,चर्चित एवं प्रसिद्धि घटनाये हुये है। जो पूरी दुनिया के लिए बार बार आश्चर्य करने वाली घटनाओ के रूप में सामने आती रही है। यहाँ कि भूमि महान एवं अद्भुत लोगो के लिये प्रसिध्द मानी जाती है। 
ऐसी ही एक ऐतिहासिक घटना का उल्लेख यहा किया जा रहा है। इसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते है। 
हमारे चैनल के टीम की बराबर यह कोशिश रहती है की लोगो के अन्दर उत्पन्न भ्रम की स्थिति क्लियर करके लोगो के सामने साफ़-साफ़ व सरल रूप से रखा जाय। 

आइये टाइटल के अनुसार और जानकारी प्राप्त करें

आज के वीडियो में जो जानकारी दी जा रही है वह ऐतिहासिक घटना से सम्बंधित है और यह घटना भारतीय इतिहास में एक संवेदनशील घटना के रूप में याद किया जाता है। यह जानकारी और बाते रानी पद्ममावती के बारे में है। उस रानी पद्ममावती के बारे में है जो अपने बचपन से लेकर युवा अवस्था तक का ज्यादा से ज्यादा समय हीरामणि तोता के साथ बिताया करती थी। क्योकि यह घटना उनके जीवन के महत्वपूर्ण यादगारो में शामिल है। 
रानी पद्ममावती का ऐतिहासिक काल चक्र 12 व 13वी  शदी से सम्बंधित है। यह घटना उस समय की है जब दिल्ली के तख़्त पर अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन था। रानी पद्ममावती,राजा गंधर्वसेन की पुत्री थी जो सिंघल प्रान्त के राजा थे। इनकी माता का नाम चम्पावती था। समय के साथ -साथ रानी पद्ममावती अपने अद्भुत सुंदरता के साथ युवा होने लगी। इनके  पिता ने इनके  विवाह के लिये स्वयंवर का आयोजन करने का विचार किया। स्वयंवर में अलग-अलग प्रान्तो के छोटे-बड़े राजा उपस्थित हुये जिन्हे स्वयंवर की प्रतियोगिता को पास करके रानी पद्ममावती से विवाह करना था। स्वयंवर में एक छोटे राज्य का राजा मलखान सिंह भी आया था जो स्वयंवर में काफी चर्चित था। लेकिन उस समय चितौड़गढ़ से राजा रावल रतन सिंह भी आये हुये थे जिनकी पहले से ही नागमती नाम की पत्नी थी,उस समय अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिये बहु विवाह करने की प्रथा थी इसी प्रथा के तहत राजा रतन सिंह मलखान सिंह को स्वयंवर की प्रतियोगिता में पछाड़ कर स्वयंवर में सबसे आगे आकर रानी पद्ममावती से विवाह कर लिया। विवाह करने के पश्चात राजा रावल रतन सिंह अपने राज्य चितौड़गढ़ वापस आ गये।  
राजा रतन सिंह कला प्रेमी और एक अच्छे राजा होने के साथ साथ अपनी पत्नी के अच्छे पति भी थे। कला प्रेमी होने के कारण  उनके दरबार में बहुत सारे विद्वान और कलाकार रहा करते थे जो अपने -अपने कलाकृति के कारण से राजदरबार के रत्न  कहे जाते थे। 

राजदरबार के रत्नो में एक कलाकार राघव चेतन सिंह भी था जो एक संगीतज्ञ था और बासुरी वादन में बहुत ही निपुण था। इसके अन्दर एक और विशेषता थी जिसके बारे में बहुत कम लोगो को जानकारी थी। वह विशेषता यह थी कि वह एक निपुण जादूगर भी था। अपने जादूगरी विद्या का उपयोग दुश्मनो को हारने के लिये भी करता था। एक बार ऐसा हुआ कि विश्वस्त सूत्रों से राजा रतन सिंह को मालूम हुआ कि राघव चेतन सिंह रात-विरात बुरी आत्माओ का आहवाहन करता है इस जानकारी के बाद राजा रतन सिंह रोष एवं गुस्से में आ गये उन्होंने राघव चेतन सिंह का सर मुड़वा कर मुह में कलिक पोतकर गधे पर बैठाकर पुरे राज्य में घुमाने के बाद राज्य से हमेशा के लिये बाहर निकाल दिया। इस अपमान के कारण राघव चेतन सिंह बदला लेने के मनसा से अल्लाउद्दीन खिलजी से मिलने का विचार बना लिया और सुल्तान से मिलने दिल्ली चल पड़ा। दिल्ली से कुछ दूर पहले एक घना जंगल हुआ करता था उसी जंगल में वह ठहर गया और वह मौके का तलाश करने लगा कि सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी जब भी इस जंगल में शिकार खेलने आयेंगे तो उस मौके का लाभ उठाकर सुल्तान से जरूर मिलेंगा। कुछ दिन बाद ऐसा ही हुआ। 
ज्यों उसे भनक लगी कि सुल्तान जंगल में शिकार खेलने आया हुआ है ठीक उसी समय राघव चेतन सिंह अपने संगीत वाले गुण के बल पर बहुत ही सुन्दर धुन में बासुरी बजाने लगा। उसके बासुरी के धुन को सुनकर सब आश्चर्य  में पड़ गये कि इतनी सुन्दर आवाज में बासुरी कौन बजा रहा है वह भी इस घने जंगल में। इस मधुर आवाज को सुनकर सुल्तान ने अपने सैनिको से बासुरी बजाने वाले को पकड़ कर लाने को कहा इसके बाद कुछ सैनिको ने उसे खोजना शुरू किया। और राघव चेतन सिंह को खोजकर सुल्तान के सामने पेश किया। सुल्तान इसके संगीत के गुण को देखते हुए महल में सम्मान पूर्वक रहने के लिए प्रस्ताव दिया। सुल्तान की इस बात को सुनकर राघव चेतन सिंह ने कहा कि आपके पास बहुत सारी उपभोग की चीजें हैं उसके बाद भी मुझ जैसे साधारण आदमी को क्यों रखना चाहते हैं इस बात को सुनकर अल्लाउद्दीन खिलजी ने राघव चेतन सिंह को अपनी बात साफ साफ कहने को कहा उसके बाद राघव चेतन सिंह ने बताया कि राजा रतन सिंह की पत्नी रानी पद्ममावती बहुत ही सुंदर है ऐसी सुंदर पत्नी तो आपके पास होनी चाहिए 

इस प्रकार रानी पद्ममावती की सुंदरता की बढ़ाई सुनकर सुल्तान की वासना जाग उठी और रानी पद्ममावती को प्राप्त करने के लिए व्याकुल हो गया और चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण करने का निर्णय लिया लेकिन चित्तौड़गढ़ पहुंचने के बाद किले से कुछ दूर पहले रुक गया क्योंकि किले की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कड़ी थी। जिससे सुल्तान को लगा कि आक्रमण करना ठीक नहीं होगा। इसलिए एक चाल चलने की योजना बनाई।  एक अपना दूत  भेजकर राजा रतन सिंह को संदेशा भिजवाया की रानी पद्ममावती को अपनी बहन की तरह मानता हूं इसलिए भाई मान कर एक बार मिलने का मौका दे।  सुल्तान के इस प्रस्ताव को राजा रतन सिंह यह सोचकर मान गए कि उसके  इस प्रस्ताव को मान कर प्रजा की रक्षा होगी साथ ही साथ सुल्तान के गुस्से से बच भी जाएंगे।  इस कारण अपनी पत्नी रानी पद्ममावती का चेहरा मिरर में दिखाने के लिए राजी हो गए। यह बात सुनते ही सुल्तान अपने कुछ चुनिंदा बलशाली योद्धाओं के साथ महल में दाखिल हुआ और पहले से निर्धारित योजना के अनुसार शीशे में रानी पद्ममावती का चेहरा देखा और रानी पद्ममावती को देखते ही सुल्तान वासना से पागल हो गया और उसी पल  अंदर ही अंदर मन में निर्णय लिया कि इसे अपनी पत्नी बनाकर अपने हरम में जरूर रखेंगे फिर उसके बाद सुल्तान षड्यंत्र द्वारा राजा रतन सिंह को अपने खेमें में मुलाकात करने का प्रस्ताव रखा सुल्तान के इस प्रस्ताव को सुनकर राजा रतन सिंह अपनी दोस्ती को मजबूत करने के लिए सुल्तान के खेमे में पहुंच गए सुल्तान और राजा रतन सिंह खेमे में बराबर टहल रहे थे उसी छड़ मौका देख कर सुल्तान ने राजा रतन सिंह को बंदी बना लेने का आदेश दे दिया। राजा रतन सिंह को बंदी बना लेने के बाद महल में संदेशा भिजवाया यदि रानी पद्मावती को मेरे खेमे में नहीं लाया गया तो राजा रतन सिंह की हत्या कर दी जाएगी। इस संदेश को सुनकर राजा रतन सिंह के सेनापति ने और रानी पद्ममावती ने योजना बनाई कि राजा को षड्यंत्र द्वारा ही बचाया जा सकता है।  इस पर रानी पद्ममावती ने संदेशा भेजवाया कि अगले सुबह 150 दासियो के पालकियों सहित मैं स्वयं भी आपके खेमे में आऊंगी।  दूसरे दिन रतन सिंह के प्रमुख सेनापति गोरा और बादल अपने चुनिंदा सैनिकों के साथ शस्त्र सहित भेष बदलकर पालकियों में बैठ गये। 
 150 पालकियों को आता देख सुल्तान ने अपने सैनिको को आदेश दिया कि इन पालकियों को ना रोका जाय। पालकिया वहा जाकर रुकी जहां राजा रतन सिंह कैद थे। रतन सिंह पालकियों को देखकर बहुत शर्मिंदा हुए की पालकी में उनकी पत्नी भी आई होगी। परंतु उन पालकियों में रानी और दासियो के जगह पर सैनिक थे जो अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित थे और मौका देखकर ताबड़तोड़ सभी सैनिकों ने धावा बोल दिया और इसी मौके को देखकर गोरा और बादल ने राजा रतन सिंह को छुड़ा लिया। छुड़ाने के दौरान ही गोरा वीरगति को प्राप्त हो गये जबकि बादल दुश्मनों के खेमे में से घोड़ा चुराकर राजा रतन सिंह को घोड़े पर बैठा कर महल की ओर भागे। 
इस प्रकार बादल राजा को बचाने में सफल हो गये सैनिकों के इस चालबाजी से सुल्तान आग बबूला हो गया और महल का घेराबंदी करने का निर्णय लिया। लगातार कई दिनों तक घेरा बंदी करके बैठा रहा। कुछ दिनों के बाद महल में खाद्य सामग्री आपूर्ति की कमी हो गयी। खाद्य आपूर्ति का अन्य कोई मार्ग ना होने के कारण अंत में राजा रतन सिंह ने महल का द्वार खोलने का आदेश दे दिये। जिससे सुल्तान के सैनिक और राजा रतन सिंह के सैनिकों के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया। इस घमासान युद्ध के बीच राजा रतन सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए। यह समाचार सुनने के बाद रानी पद्ममावती ने सोचा अब चित्तौड़ के सारे पुरुष मार दिए जाएंगे। इसलिए सामूहिक रूप से पद्ममावती के साथ बहुत सारी महिलाओं ने जौहर करने का निर्णय लिया और एक-एक करके सभी आग में कूदती चली गयी। बाद में जब अलाउद्दीन खिलजी की सेना अंदर पहुंची तो वहां की स्थिति को देखकर सुल्तान और उसकी सेना हाथ मसल कर रह गयी। उनके सामने राख के ढेर और हड्डियों के अलावा कुछ नहीं था।  इस प्रकार रानी पद्ममावती की सुंदरता और त्याग को इतिहास में याद किया जाता है। 

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

धनतेरस में भूलकर भी ना ख़रीदे ये सात सामान Don't buy these seven items even by mistake during Dhanteras

धनतेरस में भूलकर भी ना ख़रीदे ये सात सामान

धनतेरस पर भूलकर भी ना खरीदे यह 7 सामान 

आप सभी दर्शकों को हमारे चैनल के टीम की तरफ से धनतेरस और दीपावली की हार्दिक बधाई। 

आजकल बहुत सारी परंपराओं में दीपावली और धनतेरस का अपने आप में बहुत ही अलग महत्व है इसलिए धनतेरस में लोग सोचते हैं कि क्या सामान खरीदे या क्या सामान ना खरीदें ? 

इसके बारे में यहां संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है जिससे लोगों का भ्रम दूर हो सके।
आईये ऐसी वस्तुओं के बारे में जानकारी प्राप्त करें। 
धनतेरस के अवसर पर कुछ चीजों को खरीदने से पहले ध्यान दें कि वह चीज हमारे लिए शुभ फलदाई होगी या नहीं। 

इस बार धनतेरस के मुहूर्त में ऐसा योग बन रहा है कि 
  • सोना खरीदना अच्छा नहीं होगा जबकि चांदी खरीद सकते हैं 
  • इसके अलावा एल्युमिनियम के बर्तन नहीं खरीदना है जबकि तांबे का बर्तन खरीद सकते हैं। 
  • लोहे का बर्तन नहीं खरीदना है और जबकि स्टील के बर्तन खरीद सकते हैं। 
  • इसी प्रकार कैंची, चाकू जैसी धारदार चीज नहीं खरीदनी है। 
  • कांच के बर्तन बिल्कुल नहीं लेना है जबकि इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीद सकते हैं। 
  • चेहरा देखने वाला मिरर नहीं खरीदना है जबकि अष्टधातु की बनी स्वास्तिक चिन्ह खरीद सकते हैं। 
  • यदि हीरा और पन्ना रत्न से जड़ी  हुई सोना है तो इस समय खरीदना उचित नहीं होगा। 
समय और अवसर के अनुसार भिन्न-भिन्न जानकारी हमारे चैनल पर मिलती रहेगी इसके लिए हमारे चैनल को बराबर देखते रहें। https://www.youtube.com/c/Happyvalleycreator
धन्यवाद
   

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

दीपावली में यह सात उपाय नहीं किये तो पछताओगे You will regret if you do not take these seven steps during Diwali.

दीपावली में यह सात उपाय नहीं किये तो पछताओगे


दीपावली में यह सात  उपाय नहीं किया तोपछताओगे 

आज के इस लेख में हम बताएंगे कि दीपावली में उन 7 उपाय के बारे में इनका पालन करना अति आवश्यक है
भारतीय परंपराओं में कुछ ऐसे त्योहार होते हैं जिन त्योहारों को लेकर लोगों में बहुत रुचि और उत्सुकता रहती है इसलिए पूरे साल लोग बहुत बेसबरी से कुछ त्योहारों का इंतजार करते रहते हैं।  इन्हीं इंतजार करने वाले त्योहारों में दीपावली का भी अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है जिसका इंतजार लोग टकटकी लगाकर लंबे समय तक करते रहते हैं। क्योंकि कई मामलों में यह महत्वपूर्ण होता है और कई ऐसे कार्य इसी दिन प्रारंभ करना अच्छा माना जाता है इसलिए इस दिन पूजा विधिविधान से कुछ विशेष प्रकार का किया जाता है। 

आईये इस के बारे में और जाने 

दीपावली के आने पर साफ सफाई का ध्यान तो देना ही चाहिए साथ ही साथ कुछ क्रियाकलाप भी करने होते हैं। जिसे करने पर विशेष लाभ मिलता है। 
आईये इस के बारे में तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त करें।  

  • पहला उपोसथ व्रत  शील आचरण के साथ विधिवत करें क्योंकिउपोसथ व्रत चार तिथियां पर विशेष फल देता है। 
वह चार तिथियां इस प्रकार हैं दो अष्टमी, पूर्णिमा और अमावस्या का दिन। 

  • दूसरा पूरे परिवार के साथ त्रिरत्न वंदना अवश्य करें। 

  • तीसरा इस दिन विद्या आरंभ जरूर करें।

  • चौथा तिजोरी या भंडार गृह  में सुरक्षित दीप जलाएं। 

  • पांचवा पूजन के बाद सबको प्रसाद जरूर बाटें। 

  • छठवां  अपने वरिष्ठ जनों का आशीर्वाद जरूर लें। 

  • सातवां इस अवसर पर कोई विशेष कार्य की शुरुआत इस दिन कर सकते हैं जो शील बल से फलीभूत हो जाएगा। 
इस प्रकार इन सात उपायों को ठीक से जानकर और इस विधि विधान में पारंगत लोगो से ही यह कार्यक्रम संपन्न कराये। 

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

धनतेरस क्यों महत्वपूर्ण है हिन्दू धर्म के लिए। Why is Dhanteras important for Hindu religion?

धनतेरस क्यों महत्वपूर्ण है हिन्दू धर्म के लिए।


धनतेरस क्यों महत्वपूर्ण है ? हिंदू धर्म के लिए। 

भारतवर्ष में दीपावली और धनतेरस बहुत ही बड़े पैमाने पर मनाया जाता है लेकिन इससे सम्बंधित जानकारी और अन्य बातें लोगों को नहीं पता होती है कि यह त्यौहार क्यों मनाया जाता है और इसका क्या महत्व है आज इस लेख में हिंदू बंधुओ के जानकारी के लिए कुछ महत्वपूर्ण एवं संक्षिप्त बात यहां बताई जा रही है जो धनतेरस की शुरुआत एवं उसके आधारभूत जानकारी देने के लिए पर्याप्त हैं। 

आईये इसके बारे में जानकारी प्राप्त करें 

आज इस लेख में दी जाने वाली जानकारी हिंदू प्राचीन धर्म शास्त्रों से लिया गया है जो प्रमाणिक है। घर में अक्सर छोटे बच्चे एवं युवा वर्ग कौतुहल  वश अपने गार्जियन या अपने माता-पिता से पूछ लेते हैं कि यह त्यौहार क्यों मनाया जाता है ?और कब मनाया जाता है ? प्राचीन काल में धर्म ग्रंथो में लिखा मिलता है समुद्र मंथन के दौरान बहुत सारे रत्न निकले थे उसी में बताया जाता है और ऐसी लोगों की मान्यता भी है कि धनतेरस के दिन ही धनवंतरी अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इस अमृत कलश को बीमारियों में और भिन्न-भिन्न रोगों से ग्रसित लोगों के लिए,बीमारी से मुक्ति के लिए उपयोग में लाया जाता था। तब से दीपावली के पहले धनतेरस को त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।

  • धनतेरस के दिन कोई बर्तन या वस्तु खरीदने के लिए दोपहर के बाद का समय उपयुक्त माना जाता है। 
  • दीपदानकरते समय और दिया जलाते समय अपना मुख दक्षिण दिशा की तरफ रखें तो इसे उचित माना जाता है। 
इस प्रकार से हमारे चैनल पर भिन्न में जानकारी समय पर दी जाती रहेगी। 

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

जब कौरव स्वर्ग लोक से धरती पर आ गए। When the Kaurava came to earth from...

जब कौरव स्वर्ग लोक से धरती पर आ गए।

आज हम बतायेगे कि जब कौरव स्वर्ग से धरती पर आ गये। 
यह घटना पौराणिक काल की है जो महाभारत की लड़ाई के समय और उसके बाद में कुछ ऐसी घटनाये है जिसको बहुत सारे लोग नहीं जानते है। ऐसी ही विशेष घटना का उल्लेख यहा किया जा रहा है। वास्तव में यह अपने आप में बहुत ही रोचक है। इस घटना में धृतराष्ट्र के विशेष निवेदन पर विशेष आयोजन के द्वारा यह घटित कराया गया था। 

आइये इसके बारे में और जाने -

आज जो जानकारी दी जा रही है वह महाभारत से ली गयी है। यह घटना उस समय की है जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था और कौरव के पिता धृतराष्ट्र और उनकी पत्नी गान्धारी अपना हस्तिनापुर छोड़कर वानप्रस्थ जीवन जीने के लिए जंगल में चले गये। लेकिन पुत्र शोक और अपने परिजनों के ना रहने पर उनका एक-एक दिन पहाड़ के समान बित रहा था और आखिर कार दुःख की सीमा इतनी बढ़ गयी के वे अपने आप को ना रोक से और अपने दुःख को दूर करने के लिये अपने गुरु और आचार्य वेद व्यास जी के पास गये और उन्होंने कहा " हे तात श्री हमारे दुःख का कोई उपाय और निवारण करे। महाभारत की लड़ाई के बाद से मेरा मन दुःख से भरा हुआ है। कृपा कर के ऐसी उपाय और युक्ति करे की मात्र एक बार किसी प्रकार से हमारे पुत्रो का दर्शन करा दे "। 
उनके व्यथा और दुःख को सुनकर व्यास ऋषि ने कहा "हे धृतराष्ट्र तुम्हारे पुत्र स्वर्गलोक में है ख़ुशी और प्रशन्नता पूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर रहे है। तुम्हारे आग्रह पर मै एक बार उनकी आत्माओ का आहवाहन यमुना के तट पर करूँगा। आहवाहन के समय आप वहा उपस्थित रहना जिससे आप अपने पुत्रो को देख सकेंगे। 
 
उसके बाद व्यास ऋषि ने यमुना के तट पर विशेष अनुष्ठान और आहवाहन प्रारम्भ किया।पवित्र आत्माओ को रात्रि में बुलाने के बाद व्यास ऋषि ने धृतराष्ट्र से कहा "हे धृतराष्ट्र थोड़े समय के बाद यमुना के मध्य जल प्रवाह में तुम्हारे अपने पुत्रो का साक्षात दर्शन होंगे"। देखते ही देखते कुछ ही देर में यमुना के मध्य जलप्रवाह में एक बहुत ही गहरा और तेज प्रकाश दिखाई दिया। उस प्रकाश की थोड़ी उचाई बढ़ने पर सभी कौरव आस-पास हस्ते खेलते और हसी-ठिठोली करते हुए दिखायी पड़े। 
इन आत्माओ के अंदर कोई दुःख या कष्ट नहीं था वे सभी प्रसन्नता से भरे हुये थे। ऐसा दृश्य देखते ही धृतराष्ट्र भावविभोर हो गये। उसके बाद कुछ क्षणों में सारी आत्माए अदृश्य हो गयी। धृतराष्ट्र को व्यास ऋषि ने समझाया "हे धृतराष्ट्र यह मृत्युलोक है यहा जो जन्म लेता है वह मृत्यु को प्राप्त करता है। लेकिन आत्माये नहीं मरती है वह केवल अलग रूपों में उनका रूपांतरण होता है"। 
उसके बाद महर्षि वेद व्यास और धृतराष्ट्र यमुना तट से  वापस आ गये। यहा जो घटना लोगो के सामने रखी गयी है उसका मात्र उद्देश्य यह है कि प्राचीन काल के हमारे ऋषि मुनि इतने सामर्थ्यवान थे कि मरे हुये व्यक्तियों के आत्माओ को बुला सकते थे। यह उनके ज्ञान और तपस्या का बल था। 

इस प्रकार हमारे चैनल पर अलग-अलग और अद्भुत जानकारी मिलती रहेगी। इसलिए हमारे चैनल को देखते रहे और फॉलो भी करे। 

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

धन वर्षा और आर्थिक सुधार का है ये अचूक उपाय This is the surefire way to bring wealth and economic improvement.


धन वर्षा और आर्थिक सुधार का है यह अचूक उपाय 



धन वर्षा और आर्थिक सुधार का है यह अचूक उपाय 

आज के नए एपिसोड में वास्तु के अनुसार धन वर्षा और आर्थिक सुधार का अचूक उपाय बताया गया है।  संसार का कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो धनी ना होना चाहिए लेकिन कई बार ऐसा होता है कि हमारे द्वारा किए गए उपाय और प्रयास अच्छे परिणाम नहीं दे पाते हैं। इसके लिए कोशिश करते-करते बहुत लंबा समय इंतजार में बीत जाता है लेकिन आर्थिक सुधार की झलक दिखती ही नहीं है। ऐसी स्थिति में घर के मुखिया और घर के अन्य सदस्यों में नाकारात्मक विचार के कारण दिमाग में उल्टी सीधी बातें आने लगते हैं। ऐसी स्थिति में घर में आर्थिक तंगी के साथ घर में अशांति और झगड़े का माहौल बनता जाता है और चिंता के कारण कुछ लोग बीमार भी पड़ जाते हैं। धीरे-धीरे आर्थिक समस्या, घर में और हमारे चारों तरफ परेशानियों की जाल बिछा देती है। ऐसी समस्या से निजात पाने के लिए ऐसा अचूक उपाय हम बताने जा रहे हैं जिसे प्राचीन काल से आर्थिक सुधार के लिए बहुत अच्छा vastu tips  माना जाता है।

आईये  इसके बारे में और जाने 

आज जिस वास्तु टिप्स के बारे में जानकारी दी जा रही है यह वास्तव में एक विशेष प्रकार का पौधा है लेकिन यह वास्तु टिप्स के रूप में बहुत ही कारगर माना जाता है। इस पौधे का उपयोग कई जगह अलग-अलग रूपों में करते हैं। प्राचीन काल में देखा गया है कि इसका उपयोग वास्तु दोष निवारण के रूप में, वशीकरण के लिए ,नाकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए और अलग-अलग तंत्र शास्त्रों में इसका उपयोग होता देखा गया है। 
इस पौधे को नेपाल में  विरुपाद  कहा जाता है जबकि अपने देश भारत में लोग इसे बोलचाल में दो पंजों की जोड़ी या हत्था जोड़ी के नाम से जाना जाता है। हत्था जोड़ी उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र , मध्य प्रदेश के जंगलों में और नेपाल के पहाड़ी क्षेत्र में इसे देखा जाता है और जनजाति के लोग इसको बड़े पैमाने पर उपयोग करते हैं।  
यह पौधा दिखने में छोटा होता है ऐसा लगता है जैसे कोई दोनों हाथ उठाकर मुट्ठी बांधे हुए हैं। इस वास्तु उपाय के अंतर्गत इसका उपाय
  •  कोर्ट कचहरी से मुक्ति पाने के लिए, 
  • पति-पत्नी के आपसी झगड़ा को कम करने के लिए ,
  • अज्ञात शत्रु के भय से मुक्ति के लिए , 
  • वाद विवाद में विजय प्राप्ति के लिए ,
  • व्यवसाय में होने वाले हानि को रोकने के लिए ,
  • नजर की कुदृष्टि को दूर करने के लिए , 
  • रोग को दूर कर स्वास्थ्य लाभ के लिए ,
  • धन वृद्धि के लिए , 
  • विद्या प्राप्ति और प्रतियोगिता में सफलता पाने के लिए आदि बहुत सारी समस्याओं को दूर करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। 
लेकिन सबसे बड़ी खास बात यह है कि हत्था जोड़ी को सही तरीके से लोग उपयोग में लाना नहीं जानते है इसलिए वास्तु निवारण का सही लाभ नहीं मिल पाता है। 
इस लेख में स्टेप  by  स्टेप सभी बातें बताई जाएगी। इसलिए इस लेख  को पूरा जरूर पढ़ें और ध्यान दे। 

हत्था जोड़ी को जब भी उपयोग के लिए अपने घर में लाना हो तो मंगलवार और शनिवार का दिन इसके लिए अच्छा माना जाता है। इसे लाल कपड़ों में लपेट कर रखा जाता है। अगर किसी डिब्बे में रख रहे हैं तो इसके साथ में  कुछ सिंदूर भी रख सकते हैं। 
ऐसा वास्तु  के जानकार लोगों का कहना है कि यदि हत्था जोड़ी का उपयोग बिना पूजा किये  किया जाए तो लाभ नहीं देता है। 
इसे रखने के लिए चांदी के पात्र का उपयोग करना चाहिए और उपयोग में लाने से पहले इन विधियों को अपनाये जैसे -
  • हत्था जोड़ी को साफ बर्तन में (1 घंटे के लिए ) दूध और चीनी के घोल  में डुबोकर रख दें।  उसके बाद इसे इस घोल से निकाल कर साफ पानी से धूल ले। 
  • उसके बाद लौंग और कपूर के साथ इसे रख दें। 
  • उसके बाद 1 से 2 दिन के लिए किसी जार में तिल के तेल में डुबोकर रख दें। 
  • जब हत्था जोड़ी की जड़ तेल सोखना बंद कर दें तब उसे जार में से निकाल कर अपने संप्रदाय के अनुसार पूजा का आयोजन करें। 
  • पूजा का आयोजन करते समय उत्तर या पूर्व दिशा में मुख करके बैठे।  
इसका उपयोग जिस उद्देश्य के लिए करने जा रहे हैं उस उद्देश्य को महापरित्राण पाठ प्रारंभ होने से पहले भिख्खु या आचार्य से कहें। 
इसकी पूजा के क्रम में शील धारण करने के बाद त्रिरत्न वंदना अर्थात बुद्ध धम्म और संघ वंदना करने के बाद महापरित्राण पाठ और लगातार बिना रुके बुद्ध चरित्र चंद्रोदय का अखंड पाठ कराये। 

पूजा समापन के अवसर पर महामंगल सूत्र,जय मंगल अट्ठगाथा को लय बद्ध तरीके से कहें। पूजन के समापन के बाद आचार्य या भिक्खु को अपनी सुविधा के अनुसार दान दें। यदि भिक्खु है तो क्षमा याचना के साथ उनकी वंदना करें , पंचांग प्रणाम करने के बाद धन्यवाद ज्ञापन जरूर करें। यह सब संपन्न होने के बाद हत्था जोड़ी का उपयोग शुक्रवार के दिन कर सकते हैं । इसे जार के पात्र में रखकर अलमारी या तिजोरी में रख सकते हैं यदि इसे धारण करना चाहे तो चांदी के ताबीज में रखकर इसे धारण कर सकते हैं। 

इसमें इस बात का ध्यान रखना है की पूजा में अगरबत्ती का उपयोग नहीं करना है केवल धूपबत्ती का उपयोग कर सकते हैं क्योंकि अगरबत्ती में बांस की तीलिया लगती है जिनको वास्तु के अनुसार जलाना उचित नहीं  माना जाता है। आज के एपिसोड में इतना ही फिर मिलने मिलेंगे नए  व महत्वपूर्ण जानकारी के साथ यदि आप लोगों को फॉलो नहीं किया है तो फॉलो  जरूर करें। 

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

काले घोड़े की ये चीज़ जो दिलाएगी आर्थिक उन्नति This thing of black horse which will bring economic progress.

काले घोड़े की यह चीज जो दिलाएगी आर्थिक उन्नति।



आज के इस लेख में बताएंगे काले घोड़े की यह चीज जो दिलाएगी आर्थिक उन्नति।
दुनिया में सब लोगों की इच्छा यही होती है कि धन का अभाव ना होने पाए और धन की उन्नति के लिए या धन की वृद्धि के लिए लोग अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर तरह-तरह की कोशिश करते रहते हैं। यदि इन कोशिशें में या किसी कार्य को करने में उसे क्षेत्र से संबंधित expert से सुझाव लिया जाए तो कार्य की गुणवत्ता अच्छी हो सकती है और इसके साकारात्मक परिणाम मिलने की संभावना ज्यादा हो जाती है। 

आज के इस लेख में जन सामान्य की स्थिति में सुधार हो ,लोग प्रगति के रास्ते पर जल्दी बढ़ सके इसको ध्यान में रखते हुए जल्दी परिणाम देने वाले वस्तु सुझाव को बताने की कोशिश की जा रही है। 

इसके बारे में पूरी जानकारी के लिए  आइए आगे बढ़े 

बहुत सारे बताए जाने वाले वास्तु टिप्स में आज के इस लेख में बताए जाने वाला वास्तु टिप्स काफी तेज असर करने वाला है। 

यह उपाय व्यक्ति के आर्थिक स्थिति में सुधार लाता है इस उपाय को करने के लिए काले घोड़े के नाल की जरूरत है। लेकिन इसमें इस बात का ध्यान देना जरूरी है कि काले घोड़े के पैर में लगा हुआ नाल जितना पुराना होगा उतना ही अच्छा होगा यदि आपको जल्दी उपयोग किया हुआ नाल मिले तो इस बात का ध्यान देना है कि वह नाल कम से कम तीन माह पुराना हो।
हिंदू संप्रदाय में काली चीज को शनिदेव का प्रतीक माना जाता है अर्थात कला घोड़ा शनिदेव का प्रतीक माना जाता है। जिससे शनि का प्रभाव कम हो जाता है जब भी काले घोड़े का नाल ले आए तो उसमें काट छांट बिल्कुल ना करें क्योंकि यदि आप ऐसा करते हैं इसका प्रभाव समाप्त हो जाएगा। इसको उपयोग में लाने के लिए नाल को काले कपड़े में लपेटकर काले धागे से बांधकर मुख्य दरवाजे पर लटका सकते हैं या मुख्य दरवाजे पर कहीं सुरक्षित स्थान पर रख सकते हैं यदि किसी का प्रवेश द्वार का चौखट लकड़ी का बना हो तो चौखट के बीचो-बीच इसे कील द्वारा ठोक सकते हैं लेकिन याद रहे इस काले कपड़े में ही रखना है ऐसा करने पर कुछ ही दिनों में ही आर्थिक समस्या दूर होने लगेगी और पूरा परिवार आर्थिक उन्नति के तरफ बढ़ने लगेगा और घर में होने वाले झगड़ा झंझट शांत हो जाएंगे और सभी शांति पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगेंगे। 

आज के इस लेख में बस इतना ही फिर मिलेंगे नई बात और जानकारी के साथ और आपको एक विशेष सूचना देना है कि हमारा यूट्यूब चैनल भी है जिस पर इससे संबंधित और भी वीडियो देख सकते हैं लिंक नीचे दिया जा रहा है। 

https://www.youtube.com/channel/UC4L2wfvR4c1LSNdemzIG0ZA

बर्तन जो खाद्य पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया नहीं करते? these utensils which do not react with food ?

बर्तन जो खाद्य पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया नहीं करते ये बर्तन अक्रियाशील होते हैं  आज के इस लेख में हम उस बर्तन के बारे में बताएंगे कि वह कौ...